MP हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: ADPO भर्ती में 10% पदोन्नति कोटा रद्द, लिपिकीय कर्मचारियों की सीधी पदोन्नति पर रोक
MP High Court की ग्वालियर खंडपीठ ने ADPO भर्ती में 10% पदोन्नति कोटा रद्द किया। 2002 का नियम संशोधन असंवैधानिक घोषित, पुरानी पदोन्नतियां सुरक्षित।
MP High Court News: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने सहायक जिला लोक अभियोजन अधिकारी (ADPO) के पदों पर भर्ती और पदोन्नति से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने वर्ष 2002 में किए गए नियम संशोधन को असंवैधानिक मानते हुए निरस्त कर दिया है।
इस संशोधन के जरिए एडीपीओ के 10 प्रतिशत पद विभागीय पदोन्नति के माध्यम से भरने का प्रावधान किया गया था।
अदालत के फैसले के बाद इस प्रावधान के आधार पर भविष्य में एडीपीओ पदों पर पदोन्नति नहीं की जा सकेगी। हालांकि, पहले से हो चुकी पदोन्नतियां प्रभावित नहीं होंगी।
⚖️ हाईकोर्ट ने 2002 के नियम संशोधन को किया निरस्त
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने एडीपीओ भर्ती नियमों से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए वर्ष 2002 के संशोधन को संविधान के अनुच्छेद 14, 16 और 21 का उल्लंघन माना।
अदालत ने स्पष्ट किया कि संबंधित नियम संशोधन संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप नहीं है।
इसके चलते एडीपीओ पदों पर विभागीय पदोन्नति के लिए निर्धारित 10 प्रतिशत कोटा समाप्त कर दिया गया है।
इस फैसले का असर भविष्य में होने वाली एडीपीओ पदों की नियुक्तियों और पदोन्नतियों पर पड़ेगा।
📌 लिपिकीय कर्मचारियों को सीधे ADPO बनाने के प्रावधान पर सवाल
मामला मध्य प्रदेश लोक अभियोजन (राजपत्रित सेवा) भर्ती नियम, 1991 में वर्ष 2002 के दौरान किए गए संशोधन से जुड़ा है।
इस संशोधन के तहत एडीपीओ के कुल पदों में से 10 प्रतिशत पद विभागीय पदोन्नति के माध्यम से भरने का प्रावधान किया गया था।
इसके अंतर्गत कुछ श्रेणियों के लिपिकीय कर्मचारियों को एडीपीओ पद पर पदोन्नति के लिए पात्र बनाया गया था।
इनमें शामिल थे:
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सीआरपीसी क्लर्क
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सहायक ग्रेड-3
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एपीसीडी ग्रेड-3
इन कर्मचारियों के लिए विधि स्नातक की डिग्री, सात वर्ष का विभागीय अनुभव और निर्धारित आयु सीमा जैसी पात्रता शर्तें रखी गई थीं।
वहीं, शेष 90 प्रतिशत पद सीधी भर्ती के माध्यम से भरे जाने का प्रावधान था।
🏛️ पहले से पदोन्नत कर्मचारियों को मिलेगी राहत
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया है कि इस निर्णय से पहले संबंधित नियम के अंतर्गत हो चुकी पदोन्नतियों को प्रभावित नहीं किया जाएगा।
इसका मतलब है कि पहले से एडीपीओ पद पर पदोन्नत कर्मचारियों की पदोन्नति इस फैसले के कारण स्वतः निरस्त नहीं होगी।
हालांकि, अब निरस्त किए गए नियम के आधार पर भविष्य में नई पदोन्नतियां नहीं की जा सकेंगी।
👨⚖️ इन न्यायाधीशों की युगलपीठ ने सुनाया फैसला
इस महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ में हुई।
न्यायमूर्ति जीएस अहलूवालिया और न्यायमूर्ति अनुराधा शुक्ला की युगलपीठ ने रोहन शर्मा, करण श्रीवास्तव सहित अन्य याचिकाकर्ताओं की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह निर्णय सुनाया।
अदालत ने भर्ती नियमों में किए गए संशोधन की संवैधानिक वैधता पर विचार करने के बाद अपना फैसला दिया।
📚 संविधान के अनुच्छेद 14, 16 और 21 का क्या महत्व है?
हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में संविधान के तीन महत्वपूर्ण अनुच्छेदों का उल्लेख किया।
अनुच्छेद 14: कानून के समक्ष समानता और कानूनों के समान संरक्षण का अधिकार देता है।
अनुच्छेद 16: सरकारी रोजगार और नियुक्तियों में अवसर की समानता सुनिश्चित करता है।
अनुच्छेद 21: जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संरक्षण से संबंधित है।
अदालत ने संबंधित नियम संशोधन को इन संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन मानते हुए निरस्त किया है।
🔎 ADPO भर्ती प्रक्रिया पर क्या पड़ेगा असर?
हाईकोर्ट के इस निर्णय के बाद एडीपीओ भर्ती प्रक्रिया में महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिल सकता है।
अब विभाग निरस्त किए गए 10 प्रतिशत पदोन्नति कोटे के आधार पर नई नियुक्तियां या पदोन्नतियां नहीं कर सकेगा।
हालांकि, भविष्य में इन पदों को किस प्रक्रिया के तहत भरा जाएगा, यह लागू भर्ती नियमों और संबंधित विभाग के आगामी निर्णयों पर निर्भर करेगा।
इस फैसले से लोक अभियोजन विभाग में भर्ती और पदोन्नति की प्रक्रिया को लेकर नई स्थिति उत्पन्न हुई है।
निष्कर्ष
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ का यह फैसला एडीपीओ भर्ती और पदोन्नति व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
अदालत ने वर्ष 2002 के नियम संशोधन को असंवैधानिक घोषित करते हुए 10 प्रतिशत विभागीय पदोन्नति कोटा निरस्त कर दिया है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पहले से हुई पदोन्नतियां प्रभावित नहीं होंगी, लेकिन निरस्त प्रावधान के तहत भविष्य में नई पदोन्नति नहीं की जा सकेगी।
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